शिकायत के बाद कलेक्टर रणबीर शर्मा द्वारा जांच के आदेश दिए जाने से मामला चर्चा में आ गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन निर्माण कार्यों पर सरकारी राशि खर्च हुई, उनकी गुणवत्ता की निगरानी किस स्तर पर की गई और जांच में क्या तथ्य सामने आएंगे?
अपनी ही पार्टी की नगर सरकार पर सवाल, पालिका की निगरानी व्यवस्था कठघरे में
नगर पालिका में भाजपा समर्थित अध्यक्ष रिखीराम यादव के नेतृत्व वाली परिषद के बीच भाजपा पार्षद की शिकायत ने प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आखिर निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर एक निर्वाचित पार्षद को कलेक्टर जनदर्शन तक क्यों पहुंचना पड़ा? क्या निर्माण कार्यों का नियमित तकनीकी निरीक्षण हुआ था? क्या निर्धारित मापदंडों के अनुरूप काम कराया गया?
सामन
आना चाहिए। हालांकि, शिकायत दर्ज होने मात्र से निर्माण कार्यों में अनियमितता प्रमाणित नहीं होती। वास्तविक स्थिति जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
37.19 लाख के पांच काम, जांच में परखे जाएंगे गुणवत्ता के मानक
सड़क और नाली निर्माण जैसे बुनियादी कार्य सीधे आम नागरिकों की सुविधाओं से जुड़े होते हैं। ऐसे में निर्माण की गुणवत्ता, उपयोग की गई सामग्री और स्वीकृत प्राक्कलन के अनुरूप कार्य होना बेहद जरूरी है।
जांच के दौरान पांचों निर्माण कार्यों की वास्तविक स्थिति, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता, निर्धारित लंबाई-चौड़ाई एवं मोटाई, तकनीकी मानकों, माप पुस्तिका और भुगतान संबंधी दस्तावेजों का परीक्षण महत्वपूर्ण होगा। मौके पर किए गए कार्यों का तकनीकी मूल्यांकन होने से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि निर्माण निर्धारित मानकों के अनुरूप हुआ है या नहीं।
अध्यक्ष और अधिकारियों की भूमिका पर भी रहेंगी निगाहें
पार्षद की शिकायत के बाद नगर पालिका में निर्माण कार्यों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। निर्माण कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में संबंधित अधिकारियों, तकनीकी अमले और स्वीकृति एवं मूल्यांकन प्रक्रिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
ऐसे में जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि कार्यों की निगरानी किस स्तर पर हुई, निर्माण की गुणवत्ता का मूल्यांकन कैसे किया गया और भुगतान से पहले निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं।
हालांकि, जांच पूरी होने से पहले नगर पालिका अध्यक्ष, अधिकारियों या किसी अन्य व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता प्रमाणित होती है, तो संबंधित जिम्मेदारों की जवाबदेही नियमानुसार तय की जानी चाहिए।
ठेकेदारों की जवाबदेही भी होगी अहम
निर्माण कार्यों में ठेकेदारों की भूमिका भी जांच के दायरे में महत्वपूर्ण रहेगी। यदि निर्धारित मानकों से कम गुणवत्ता की सामग्री का इस्तेमाल हुआ है, स्वीकृत मापदंडों के विपरीत निर्माण किया गया है या भुगतान में कोई गड़बड़ी सामने आती है, तो संबंधित दस्तावेजों और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की जानी चाहिए।
सरकारी धन जनता की अमानत है। इसलिए विकास कार्यों की गुणवत्ता का आकलन केवल कागजी रिकॉर्ड के आधार पर नहीं, बल्कि मौके पर तकनीकी जांच के जरिए भी किया जाना जरूरी है।
कलेक्टर के जांच आदेश के बाद अब कार्रवाई का इंतजार
कलेक्टर रणबीर शर्मा द्वारा जांच के आदेश दिए जाने के बाद अब नगरवासियों की निगाहें जांच की निष्पक्षता और उसके परिणामों पर टिकी हैं। शिकायत में शामिल सभी पांच निर्माण कार्यों की अलग-अलग जांच, संबंधित अभिलेखों का परीक्षण और मौके की वास्तविक स्थिति का आकलन महत्वपूर्ण होगा।
जांच प्रक्रिया में नगर पालिका प्रशासन और संबंधित ठेकेदारों का पक्ष भी सामने आना चाहिए, ताकि सभी तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष निष्कर्ष निकाला जा सके। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, आरोप प्रमाणित नहीं होने की स्थिति में भी जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किए जाने चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल-विकास कार्यों की निगरानी कौन कर रहा है?
गरियाबंद नगर पालिका का यह मामला केवल पांच सड़क एवं नाली निर्माण कार्यों तक सीमित नहीं है। यह सार्वजनिक धन के उपयोग, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और स्थानीय निकाय की जवाबदेही से जुड़ा अहम मुद्दा है। जब सत्तारूढ़ दल का ही पार्षद अपनी नगर सरकार में कराए गए निर्माण कार्यों पर सवाल उठाकर कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत करता है, तो निगरानी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
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