गरियाबंद l वेब डेस्क।
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के दूरस्थ गांव भालू डिग्गी से एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत सामने आई है। सरकारी दावों और पोस्टरों में जहां “हर गांव तक स्वास्थ्य सुविधा" की बात कही जाती है, वहीं इस गांव में मरीजों को आज भी कंधों के सहारे अस्पताल तक पहुंचाना पड़ रहा है।
क्या है घटना?
18 मार्च को गांव के एक बुजुर्ग श्याम की तबीयत अचानक बिगड़ गई। तेज बुखार के बाद परिजनों ने तत्काल 108 एम्बुलेंस सेवा को कॉल किया। लेकिन एम्बुलेंस गांव तक पहुंचने में असमर्थ रही और मरीज को सड़क तक लाने की बात कही गई।
8 लोगों ने उठाया जिम्मा
इसके बाद गांव के लोगों ने मिलकर बुजुर्ग को कंधों पर उठाया। चार नहीं, बल्कि आठ लोगों ने बारी-बारी से मरीज को पहाड़ी रास्तों, जंगल और पगडंडियों से नीचे तक पहुंचाया। कई किलोमीटर का यह सफर तय करने के बाद सड़क पर खड़ी 108 एम्बुलेंस तक मरीज को लाया गया, जहां से उसे मैनपुर अस्पताल ले जाया गया।
विकाश अब भी दूर
कुल्हाड़ी घाट ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाला भालू डिग्गी गांव कभी नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। हालांकि अब नक्सल गतिविधियां कम हो चुकी हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं का अभाव आज भी बना हुआ है। सड़क, स्वास्थ्य और संचार जैसी सुविधाएं यहां तक नहीं पहुंच पाई हैं।
ग्रामीणों में नाराजगी
ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी योजनाएं सिर्फ कागजों और पोस्टरों तक सीमित हैं। “एम्बुलेंस को कॉल करने के बाद भी अगर हमें मरीज को कंधों पर ढोना पड़े, तो फिर सुविधा का क्या मतलब?” - एक ग्रामीण ने सवाल उठाया।
बड़ा सवाल
यह घटना स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और सरकारी दावों पर सवाल खड़ा करती है। क्या दूरस्थ और पहाड़ी इलाकों के लिए अलग से ठोस व्यवस्था की जरूरत नहीं है?
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